अमेरिका की राजनीति में इन दिनों एक बड़ा मुद्दा चर्चा में है पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump द्वारा लगाए गए टैरिफ (आयात शुल्क) को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी। अदालत ने संकेत दिया है कि 2018 में लगाए गए इन टैरिफों की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठ सकते हैं। ये टैरिफ खासकर चीन, यूरोप और अन्य देशों से आने वाले इस्पात और एल्युमिनियम उत्पादों पर लगाए गए थे, जिनका असर पूरी वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ा था।
सुप्रीम कोर्ट के कुछ जजों ने ट्रंप प्रशासन के उस समय के कदम पर संदेह जताया है, जिसमें उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर व्यापारिक प्रतिबंध लगाए थे। अदालत का कहना है कि यदि किसी राष्ट्रपति को इतनी व्यापक शक्तियां दी जाएं कि वह कांग्रेस की अनुमति के बिना किसी भी देश पर टैरिफ लगा दे, तो यह संविधान के “संतुलन सिद्धांत” के खिलाफ होगा। इस सुनवाई में अमेरिकी व्यापार संघों और उद्योगों ने भी दलील दी कि ट्रंप के फैसले से अमेरिकी उद्योगों को नुकसान हुआ और कीमतें बढ़ीं।
अब सवाल उठता है क्या वर्तमान या भविष्य के राष्ट्रपति को ऐसे टैरिफ लगाने का अधिकार है?
संविधान के तहत अमेरिकी राष्ट्रपति “राष्ट्रीय सुरक्षा” के तहत कुछ व्यापारिक फैसले ले सकते हैं, लेकिन वे पूरी तरह स्वतंत्र नहीं हैं। उन्हें कांग्रेस द्वारा पारित कानूनों और ट्रेड एक्ट 1962 की सीमाओं में रहना होता है। अगर सुप्रीम कोर्ट ट्रंप के कदम को असंवैधानिक करार देता है, तो आने वाले समय में किसी भी राष्ट्रपति की “टैरिफ पॉलिसी” पर सख्त नियंत्रण लग सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर कोर्ट राष्ट्रपति की शक्तियों को सीमित करता है, तो भविष्य में अमेरिका की अंतरराष्ट्रीय व्यापार नीति पर बड़ा असर पड़ेगा। इससे राष्ट्रपति को हर व्यापारिक कदम के लिए कांग्रेस की मंजूरी लेनी पड़ सकती है। वहीं, चीन और यूरोपीय देशों के साथ चल रहे व्यापारिक विवादों में भी नया मोड़ आ सकता है।
कुल मिलाकर, सुप्रीम कोर्ट की यह सुनवाई न केवल ट्रंप युग की नीतियों की समीक्षा है, बल्कि यह तय करेगी कि अमेरिका में राष्ट्रपति की आर्थिक और राजनीतिक शक्तियों की सीमा क्या होगी। आने वाले फैसले से न सिर्फ अमेरिकी उद्योग बल्कि वैश्विक बाजार भी प्रभावित होंगे।
