तुर्की में अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच चल रही शांति वार्ताओं के दौरान दोनों देशों की सीमा पर एक बार फिर तनाव बढ़ गया है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, कंधार प्रांत के स्पिन बोल्डक इलाके में गुरुवार रात दोनों देशों की सेनाओं के बीच गोलीबारी हुई। अफगानिस्तान के अधिकारियों ने दावा किया कि पाकिस्तानी बलों ने पहले फायरिंग की, जबकि पाकिस्तान ने आरोप लगाया कि गोलीबारी अफगान पक्ष से शुरू हुई। इस झड़प में अब तक कम से कम 5 लोगों की मौत और कई घायल होने की खबर है।
यह घटना उस समय हुई जब इस्तांबुल (तुर्की) में दोनों देशों के प्रतिनिधि संघर्षविराम (ceasefire) को मजबूत करने के लिए बैठक कर रहे थे। इन वार्ताओं का उद्देश्य अक्टूबर में हुए अस्थायी शांति समझौते की समीक्षा और उसे स्थायी रूप देने का था। लेकिन सीमा पर हुई इस गोलीबारी ने शांति प्रक्रिया पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
पाकिस्तान का आरोप है कि अफगानिस्तान में मौजूद कुछ आतंकी समूह, खासकर तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP), उसके खिलाफ हमले कर रहे हैं। वहीं, अफगानिस्तान का कहना है कि पाकिस्तान सीमा पार हवाई हमले कर उसकी संप्रभुता का उल्लंघन कर रहा है। दोनों देशों के बीच यह अविश्वास लगातार बढ़ रहा है, जो किसी भी समझौते के रास्ते में बड़ी बाधा बन गया है।
तुर्की में चल रही वार्ता में दोनों पक्षों ने सीमावर्ती इलाकों में निगरानी तंत्र स्थापित करने, सीमा पार हमलों की जांच करने और भविष्य में संघर्ष रोकने के उपायों पर चर्चा की। पाकिस्तान चाहता है कि अफगानिस्तान अपने इलाक़े में सक्रिय आतंकी संगठनों पर सख्त कार्रवाई करे। वहीं, अफगान प्रतिनिधियों ने कहा कि वे केवल उसी समझौते पर सहमत होंगे जिसे वे जमीनी स्तर पर लागू कर सकें।
इस बीच, सीमा पर रहने वाले आम नागरिकों के लिए यह संघर्ष भारी पड़ रहा है। व्यापार, आवाजाही और जीवन यापन लगभग ठप हो गया है। स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्हें शांति चाहिए, राजनीति नहीं। दोनों देशों की जनता चाहती है कि यह वार्ता किसी ठोस नतीजे तक पहुंचे ताकि दशकों से जारी तनाव खत्म हो सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक दोनों देशों के बीच विश्वास बहाल नहीं होता, तब तक किसी भी समझौते का असर लंबे समय तक नहीं टिक पाएगा। यह गोलीबारी एक बार फिर याद दिलाती है कि शांति समझौते कागज पर तो लिखे जा सकते हैं, लेकिन असली चुनौती उन्हें जमीन पर लागू करने की होती है।
अगर इस्तांबुल वार्ता में कोई ठोस निगरानी तंत्र बन पाया और दोनों देश अपने वादों का पालन करते हैं, तो सीमा पर स्थिरता लौट सकती है। अन्यथा, इस संघर्ष की आग फिर भड़क सकती है, जिसका खामियाजा आम लोगों को ही भुगतना पड़ेगा।
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